प्रथम-मन्त्र

मन्त्रार्थ

सभी सुखी हों , सभी निरामय(नीरोग) हों।

सभी भद्र (अच्छा,शुभ) देखें, किसी को भी दुःख(के भाग) की प्राप्ति न हो।

द्वितीय-मन्त्र

मन्त्रार्थ

हे देवगण! हम यजन करते हुए; कानों से शुभ, कल्याणकारी (शब्द) सुनें; नेत्रों से शुभ, कल्याणकारी (दृश्य) देखें; स्वस्थ और दृढ़ अगों से एवं शरीरों से पुत्रपौत्रादिसहित; भगवान की स्तुति करते हुए; जो आयु देवहित में (उपासना में) उपयोगी हो सके, (उसका) उपभोग करें (उसे) प्राप्त करें)।