अर्थ-
1.जो कुन्द (कुमुदनी) के पुष्प की माला धारण किये हुए है तथा इन्दु (चन्द्रमा), हिमराशि के समान धवल वर्ण वाली एवं शुभ्र (कान्ति-युक्त, श्वेत) वस्त्रों को धारण किये हुए हैं,
वीणा का वरणकिये हुए जिनके हस्त उस वीणा के दण्ड से शोभायमान हैं, जो पद्मासन (कमल के आसन) पर विराजमान हैं,
जो ब्रह्मा, अच्युत (अविनाशी) शंकरादि देवताओं के द्वारा सदा वंदित हैं,
वे भगवती सरस्वती देवि मेरी (मुझपर कृपाकरें) समस्त अज्ञानता, जड़ता को दूर करें।
2. उन
शुक्लवर्ण वाली, सम्पूर्ण चराचर जगत् में व्यात, आदि-शक्ति परमब्रह्म के विषय में किये गये चिन्तन के सार रूप परम(उत्कर्ष) को धारण करने वाली
वीणा एवं पुस्तक(वेदों) को हाँथों में धारण करने वाली, अभयदान देने वाली, जड़ता तथा अन्धकार का ऩाश करने वाली
स्फटिक की माला धारण किये हुये पद्मासन में संस्थित(विराजमान)
बुद्धिप्रदान (करने वाले सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलंकृत) उन परमेश्वरी, भगवती, शारदा का मैं वन्दन(शीश-नमन) करता हूँ।