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यहाँ परब्रह्म के अविनाशी एवं अविभाज्य
स्वरूप की उक्ति की गयी है। |
| यजन-विधान की पूर्णता के लिये इसका वाचन
किया जाता है |
मन्त्रार्थ
परब्रह्म पूर्ण है, पूर्ण से उत्पन्न है इससे उसे पूर्ण कहते हैं।
पूर्ण में से पूर्ण निकालने पर पूर्ण ही अवशिष्ट होता है।