नोटः- इस मंत्र में पाँच अक्षर हैं – न, म, शि, व, य । इन पाँच अक्षरों पर आदि शंकराचार्य(700- ईस्वी) में शिव-पँचाक्षर स्तोत्र की रचना की। अनेकानेक श्रद्धालु एवं उपासक अपने दैनंदिनी यजन-पूजन में इसका पाठ करते हैं।

मन्त्रार्थ –
ॐ = परमात्मा का नाम
नमः = नमन है, नमस्कार है,
शिवाय = भगवान शंकरको (के लिये)।
भावार्थ- भगवान शंकर को नमन है, नमस्कार है।
 

मन्त्रार्थ
जिनके गले में नागमाला है, जो भस्माङ्ग वाले हैं, जो तीन नेत्रों वाले, नित्य शुद्ध, दिगम्बर एवं महेश्वर हैं उन भगवान शंकरके लिये ‘न’ कार(न उच्चारण) से नमस्कार है।

जो गंगा के निर्मलजल तथा चन्दन से अर्चित(पूजित), नन्दीश्वर, काम को जीतने वाले प्रमथनाथ भगवान महेश्वर हैं जो मन्दारपुष्पों एवं अन्य उत्तम पुष्पों से पूजित होते हैं, उन भगवान शंकरके लिये ‘म’ कार(म उच्चारण) से नमस्कार है।

जो गौरीपति, सृष्टि के आदि कहे जाने वाले, सूर्य, दक्ष के यज्ञ का विनाश करने वाले, कंठ में विष धारण करने से नीलकण्ठ, वृषध्वज(वाहन) वाले हैं, उन भगवान शंकरके लिये ‘शि’कार (शि उच्चारण) से नमस्कार है।

जो वशिष्ठ, कुम्भ, उद्भव, गौतम, आर्य, मुनि, इन्द्रादि देवों के द्वारा अर्चित हैं, कैलास के शिखर पर रहने से जो शेखर कहे जाते हैं, चन्द्र, सूर्य, वैश्वानर जिनके नेत्र हैं, उन भगवान शंकरके लिये ‘व’ कार(व उच्चारण) से नमस्कार है।

जो यक्षस्वरूप वाले है, जटाओं को धारण करते हैं पिनाक(त्रिशूल) शस्त्र को हाथ में धारण करते हैं, जो दिव्यस्वरूप वाले, देव, दिगम्बर हैं, उन भगवान शंकरके लिये ‘य’ कार(य उच्चारण) से नमस्कार है।
पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते।।6।।
ये पाँच अक्षर पुण्यप्रद हैं, जो इनको भगवान शिव के सान्निध्य में पठन करता है,
वह शिवलोक को प्राप्त करता है, तथा भगवान शिव के साथ निवास करता है।