ॐ
ओम् या ओमकार को परम मन्त्र की संज्ञा दी गयी है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने अक्षरों में अपने आप को ओंकार बतलाया है। सृष्टि के आदि में भी यही मूल अक्षर कहा गया है।
योगसूत्र में भी योगियों के लिये ॐ के जप तथा ध्यान को बतलाया गया है।
परम पवित्र ॐ की महिमा का गुणगान कठोपनिषद्, माण्डूक्योपनिषद् आदि उपनिषदों में किया गया है।
'अ' , 'उ' और 'म' इन तीन का समन्वयात्मक समूह ॐ है। ध्वनि वैज्ञानिकों ने ऐसा अनुमान प्रस्तुत किया है कि सुदूर अन्तरिक्ष में व्याप्त तरंगों की प्रकृति में ओम् की लयात्मकता प्रतीत होती है। इससे वैदिक मान्यता कि सृष्टि के आदि में ओम है, पुष्ट होती है।